वृन्दारण्योत्तमं नास्ति-नास्ति - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (17.125)

वृन्दारण्योत्तमं नास्ति-नास्ति - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (17.125)

वृन्दारण्योत्तमं नास्ति-नास्ति मत्तोऽधमं क्वचित् ।
राधा नाम्नः प्रभावेण-यदि स्यान्मेलनं तयोः ॥

- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (17.125)

श्रीवृन्दावन से अधिक श्रेष्ठ (अधम-उद्धारक) धाम और कोई नहीं है, एवं मेरे समान अधम और कोई नहीं है।  "श्रीराधा" नाम के बल से ही इन दोनों का मिलन हो सकता है  (अर्थात् “श्रीराधा” नाम के बिना श्रीवृन्दावन का संयोग वा वास कदापि नहीं हो सकता) ।