(राग बसंत)
जुगल किसोर मेरे कुंजबिहारी प्यारी,
बन बिहार बिहरत नव रंगा । [1]
अरुन हरित मुकलित द्रुम पल्लव,
अलिकुल गुंज अनंग तरंगा ॥ [2]
सौंधें बहुत अबीर अरगजा,
खेल परस्पर छिरकत अंगा । [3]
श्रीबीठलविपुल बिनोद रीति रस,
सुख देखत ललितादिक संगा ॥ [4]
- श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (15)
बसंत की छवि का वर्णन करते हुए सखी कहती है कि हमारे युगल बिहारी बिहारिनी वन विहार करते हुए नव नव रंगों को प्रकाशित कर रहे हैं । [1]
द्रुम लताओं में विकसित पुष्पों एवं पल्लवों की अरूणता एवं हरितमा देखते ही बनती है जिनपर भ्रमरों की गुंजार दिव्य अनंग की तरंगों को विकसित कर रही हैं । [2]
श्री युगल एवं सखीजन परस्पर खिलते हुए सौरभ से युक्त अबीर एवं अरगजा को छिटक रहे हैं । [3]
श्री बीठलविपुल देव जी कहते हैं कि श्री ललितादिक सखियों के मध्य इस विपुल विनोद की रस रीति का अवलोकन कर वे भी परमानंद को प्राप्त कर रहे हैं । [4]
जुगल किसोर मेरे कुंजबिहारी प्यारी,
बन बिहार बिहरत नव रंगा । [1]
अरुन हरित मुकलित द्रुम पल्लव,
अलिकुल गुंज अनंग तरंगा ॥ [2]
सौंधें बहुत अबीर अरगजा,
खेल परस्पर छिरकत अंगा । [3]
श्रीबीठलविपुल बिनोद रीति रस,
सुख देखत ललितादिक संगा ॥ [4]
- श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (15)
बसंत की छवि का वर्णन करते हुए सखी कहती है कि हमारे युगल बिहारी बिहारिनी वन विहार करते हुए नव नव रंगों को प्रकाशित कर रहे हैं । [1]
द्रुम लताओं में विकसित पुष्पों एवं पल्लवों की अरूणता एवं हरितमा देखते ही बनती है जिनपर भ्रमरों की गुंजार दिव्य अनंग की तरंगों को विकसित कर रही हैं । [2]
श्री युगल एवं सखीजन परस्पर खिलते हुए सौरभ से युक्त अबीर एवं अरगजा को छिटक रहे हैं । [3]
श्री बीठलविपुल देव जी कहते हैं कि श्री ललितादिक सखियों के मध्य इस विपुल विनोद की रस रीति का अवलोकन कर वे भी परमानंद को प्राप्त कर रहे हैं । [4]

