जोरी अद्भुत किन ठई मन रीझे लखि अंग - श्री पीतांबर देव जी की बानी (54)

जोरी अद्भुत किन ठई मन रीझे लखि अंग - श्री पीतांबर देव जी की बानी (54)

जोरी अद्भुत किन ठई, मन रीझे लखि अंग ।
घन दामिनी अविचल प्रभा, घटत न बढ़त उमंग ॥

- श्री पीतांबर देव जी, श्री पीतांबर देव जी की बानी (54)

यह दिव्य जोड़ी (श्री श्यामा-श्याम) अति अद्भुत एवं समतारहित है, जिनके अंगों का अवलोकन कर मन रीझ जाता है। घन और दामिनी की प्रभा से युक्त इस जोड़ी की उमंग कभी घटती नहीं, अपितु प्रति क्षण बढ़ती जाती है।