निहं हिंदू नहिं तुरक हम, नहिं जैनी अंग्रेज - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (5.7)

निहं हिंदू नहिं तुरक हम, नहिं जैनी अंग्रेज - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (5.7)

नहिं हिंदू नहिं तुरक हम, नहिं जैनी अंग्रेज।
सुमन सम्हारत रहत नित, कुंजबिहारी सेज॥

- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (5.7)

हम न तो हिन्दू हैं, न ही मुसलमान (तुर्क), न ही जैन हैं, और न ही अंग्रेज। हमारी (सखियों की) तो बस एक ही पहचान और सेवा है—हम तो अनन्य रसिक भाव से नित्य-निरंतर निकुंज-भवन में अपने प्रिया-प्रियतम की शैय्या के पुष्पों को संवारने और उनकी सेवा में ही निमग्न रहते हैं।