(राग जैजैवन्ती)
आज विराज रहे मणि मंदिर,
नंदनँदन वृषभानुकिशोरी । [1]
केलि करत युग याम गई निशि,
लेत जम्हाई साँवरो गोरी ॥ [2]
अति आलस वश झूमत दोऊ,
बात करत मुख अटपटि भोरी । [3]
नारायण सोई बड़भागी,
जो नित निरखत है यह जोरी ॥ [4]
- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, शयन लीला (4)
आज मणि मंदिर में नंदनंदन श्री कृष्ण एवं वृषभानु किशोरी श्री राधा की जोड़ी विराज रही है । [1]
केली करते करते ऐसा प्रतीत होता है कि रात्रि का पहर युग समान बीत गया और अब वे गौर श्याम रंग की जोड़ी जम्हाई ले रही है । [2]
अति आलस में भर कर दोनों झूम रहे हैं और मुख से अटपटी एवं भोरी बातें कर रहे हैं । [3]
श्री नारायण स्वामी जी कहते हैं कि केवल वे ही बड़भागी जन हैं जो इस जोड़ी को नित्य निहारते रहते हैं । [4]
आज विराज रहे मणि मंदिर,
नंदनँदन वृषभानुकिशोरी । [1]
केलि करत युग याम गई निशि,
लेत जम्हाई साँवरो गोरी ॥ [2]
अति आलस वश झूमत दोऊ,
बात करत मुख अटपटि भोरी । [3]
नारायण सोई बड़भागी,
जो नित निरखत है यह जोरी ॥ [4]
- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, शयन लीला (4)
आज मणि मंदिर में नंदनंदन श्री कृष्ण एवं वृषभानु किशोरी श्री राधा की जोड़ी विराज रही है । [1]
केली करते करते ऐसा प्रतीत होता है कि रात्रि का पहर युग समान बीत गया और अब वे गौर श्याम रंग की जोड़ी जम्हाई ले रही है । [2]
अति आलस में भर कर दोनों झूम रहे हैं और मुख से अटपटी एवं भोरी बातें कर रहे हैं । [3]
श्री नारायण स्वामी जी कहते हैं कि केवल वे ही बड़भागी जन हैं जो इस जोड़ी को नित्य निहारते रहते हैं । [4]

