हमारी राधे, अति भोरी सरकार ।
हठि हठि दीन जनन अपनावति, देति प्रेम उपहार ॥ [1]
विधि निषेद को भेद मिटावति, प्रणत भये इक बार ।
निज परिकर बिच करि किंकरि नित, राखत रास मझार ॥ [2]
निगमागम मुख तकत रहत जो, कहत अगम्य अपार ।
लली ‘कृपालु’ अपेलि करति इमि, सरल सुभायन हार ॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, दैन्य माधुरी (94)
हमारी स्वामिनी श्री वृषभानुनन्दिनी अत्यन्त ही भोली-भाली हैं । वे बरबस शरणागत दीनजनों को अपना बना लेती हैं, एवं उसे विशुद्ध-प्रेम-दान कर देती हैं । [1]
वेद में कहे गये विधि-निषेध अर्थात् कर्तव्याकर्तव्य के झगड़ों से अलग कर देती हैं । केवल एक बार उनकी शरण में जो हो जाये, वे अपनी दिव्य सखियों के परिकर में उस शरणागत को दासी बनाकर निरन्तर ही महारास-मण्डल में रख लेती हैं । [2]
वेद एवं शास्त्र जो कि किशोरी जी को अगम्य एवं अपार कहते हैं, वे किंकर्तव्यविमूढ़-से होकर आश्चर्यचकित हो जाते हैं । श्री कृपालु जी कहते हैं कि किशोरी जी अपने सरल स्वभाव एवं भोलेपन के कारण ही वेदों-शास्त्रों के विपरीत इस प्रकार की धांधली-रूप कृपा करती हैं । [3]
हठि हठि दीन जनन अपनावति, देति प्रेम उपहार ॥ [1]
विधि निषेद को भेद मिटावति, प्रणत भये इक बार ।
निज परिकर बिच करि किंकरि नित, राखत रास मझार ॥ [2]
निगमागम मुख तकत रहत जो, कहत अगम्य अपार ।
लली ‘कृपालु’ अपेलि करति इमि, सरल सुभायन हार ॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, दैन्य माधुरी (94)
हमारी स्वामिनी श्री वृषभानुनन्दिनी अत्यन्त ही भोली-भाली हैं । वे बरबस शरणागत दीनजनों को अपना बना लेती हैं, एवं उसे विशुद्ध-प्रेम-दान कर देती हैं । [1]
वेद में कहे गये विधि-निषेध अर्थात् कर्तव्याकर्तव्य के झगड़ों से अलग कर देती हैं । केवल एक बार उनकी शरण में जो हो जाये, वे अपनी दिव्य सखियों के परिकर में उस शरणागत को दासी बनाकर निरन्तर ही महारास-मण्डल में रख लेती हैं । [2]
वेद एवं शास्त्र जो कि किशोरी जी को अगम्य एवं अपार कहते हैं, वे किंकर्तव्यविमूढ़-से होकर आश्चर्यचकित हो जाते हैं । श्री कृपालु जी कहते हैं कि किशोरी जी अपने सरल स्वभाव एवं भोलेपन के कारण ही वेदों-शास्त्रों के विपरीत इस प्रकार की धांधली-रूप कृपा करती हैं । [3]

