खान पान सुख भोग की, जो लों मन में भूख ।
तो लों वृंदा विपिन के, प्यारे लगें न रूख ॥
- श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (18)
जब तक मन में खान-पान, विषय-वासना और संसार के भौतिक सुख भोगों की लालसा बनी रहती है, तब तक श्री वृन्दावन धाम के वृक्ष और यहाँ की रज-वीथियाँ हृदय को प्रिय नहीं लगती।
तो लों वृंदा विपिन के, प्यारे लगें न रूख ॥
- श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (18)
जब तक मन में खान-पान, विषय-वासना और संसार के भौतिक सुख भोगों की लालसा बनी रहती है, तब तक श्री वृन्दावन धाम के वृक्ष और यहाँ की रज-वीथियाँ हृदय को प्रिय नहीं लगती।

