दादुर मोर पपैया बोलत - श्री चतुर्भुजदास जी

दादुर मोर पपैया बोलत - श्री चतुर्भुजदास जी

(राग मल्हार)
दादुर मोर पपैया बोलत, कोयल सब्द करत किलकारी। [1]
गरजत गगन दामिनी दमकत, गावत मलार तान लेत न्यारी॥ [2]
कुंज महल में बैठे दोऊ, करत विलास भरत अंकवारी। [3]
'चतुर्भुज' प्रभु गिरिधर छवि निरखत, तन मन धन न्यौछावर वारी॥ [4]

- श्री चतुर्भुजदास जी

आज कुंज महल में दादुर, मोर और पपीहा मधुर स्वर में गान कर रहे हैं, तथा कोयल अपनी मधुर किलकारियों से वातावरण को और मनोहर बना रही है। [1]

आकाश में काले बादल छाए हैं, बिजली गर्जना कर रही है, और उसी समय श्री श्यामा-श्याम सुंदर राग मल्हार में मधुर गान कर रहे हैं। [2]

दोनों कुंज भवन में विराजकर एक-दूसरे को अंकों में भरकर प्रेम-विलास कर रहे हैं। [3]

श्री चतुर्भुज दास जी कहते हैं—“श्री प्रिया-प्रियतम की इस अद्भुत छवि को देखकर मेरा तन, मन और धन स्वतः ही न्योछावर हो जाता है।” [4]