कोटि-कोटि रसना जो रोम - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार सभा मण्डल (126)

कोटि-कोटि रसना जो रोम - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार सभा मण्डल (126)

कोटि-कोटि रसना जो रोम-रोम प्रति हौंहिं,
प्यारी जू के रूप कौ न प्रमान कह्यौ जात है। [1]
अतिहि अगाध सिंधु पार नाहिं पावै कोऊ,
थोरी बुद्धि सीप माँझि कैसे कैं समात है॥ [2]
छिन-छिन नई-नई माधुरी तरंग रंग,
देखैं नख-चंद्रिकनि चंद हू लजात है। [3]
'हित ध्रुव' अंग-अंग बरसत छबि स्वाति,
नैना पिय-चातिक तो कैहूँ न अघात हैं॥ [4]

- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार सभा मण्डल (126)

यदि शरीर के प्रत्येक रोम से कोटि-कोटि जिह्वाएँ प्रकट हो जाएँ, तब भी रूप-राशि प्रिया के अनंत सौंदर्य और माधुर्य का सीमित वर्णन करना असंभव ही रहेगा। [1]

प्रिया-रूप-सुधा के इस अथाह और असीम सागर की थाह कोई नहीं ले सकता, जैसे सीमित बुद्धि रूपी छोटी सी सीप में विशाल महासागर का समाना असंभव है। [2]

प्रिया के रूप-सौंदर्य में हर क्षण नवीन माधुरी की लहरें उठती रहती हैं, और उनकी नख-ज्योति के सम्मुख चंद्रमा भी स्वयं को लज्जित अनुभव करता है। [3]

श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि प्रिया के अंग-प्रत्यंग से निरंतर छवि रूपी स्वाति अमृत की वर्षा होती रहती है, जिसे पीने के बाद भी प्रियतम के नेत्र रूपी चातक कभी संतुष्ट नहीं होते और सदा उस रूप सुधा के लिए व्याकुल बने रहते हैं। [4]