मेरौ मन संतन हाथ बिकानौं - श्री प्रेम सखी जी

मेरौ मन संतन हाथ बिकानौं - श्री प्रेम सखी जी

मेरौ मन संतन हाथ बिकानौं ।
और छाँड़ि भार सुखसार हाथ गहि रसिकन रसमें आनौं ॥ [1]
मधुकर तौ सौरभ कै लोभी कीट कीच लपटानौं ।
प्रेमसखी बलि जाय कुमरकी तिन यह रसमें सानौं ॥ [2]

- श्री प्रेम सखी जी

मेरा मन रसिक संतों के हाथों में बिक चुका है जिनकी कृपा से अब इस हृदय में भी अद्बुत सुख सार रूपी वृंदावन रस का प्रादुर्भाव हो चुका है । [1]

जिस प्रकार भँवर सुगंधित फूलों के रस को ही ग्रहण करता है और कीड़ा कीचड़ से ही लिपटता है उसी प्रकार बलिहारी है श्री कुंवर लाल [श्री कृष्ण] की जिन्होंने अपने अति अद्बुत रस से हमारे हृदय को सराबोर कर दिया है । [2]