देह गेह की सुधि नहीं, टूटि गई जग प्रीत - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (159)

देह गेह की सुधि नहीं, टूटि गई जग प्रीत - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (159)

देह गेह की सुधि नहीं, टूटि गई जग प्रीत ।
नारायण गावत फिरैं, प्रेम भरे रसगीत ॥

- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (159)

परम प्रेम की उस अवस्था में अब न तो इस देह (शरीर) का भान रहा है और न ही गेह (घर-संसार) की कोई सुधि रही है। संसार के प्रति जो भी आसक्ति या प्रीति थी, वह अब स्वतः ही टूट चुकी है। श्री नारायण स्वामी अब केवल भगवद-प्रेम में सराबोर होकर आनंदमयी रस के गीतों को गाते हुए सर्वत्र विचरण करते हैं।