सरद चंद प्यारी बदन, प्रीतम नैंन चकोर ।
हरषि रूप निरखत रहैं, इकटक ये ही ओर ॥
- श्री रूप सखी, श्रृंगार रस के दोहे (27)
प्रीतम कृष्ण के नेत्र चकोर समान हैं, जो शरद-चन्द्र समान श्री राधा के रूप को नित्य हर्षपूर्वक निहारते रहते हैं।
हरषि रूप निरखत रहैं, इकटक ये ही ओर ॥
- श्री रूप सखी, श्रृंगार रस के दोहे (27)
प्रीतम कृष्ण के नेत्र चकोर समान हैं, जो शरद-चन्द्र समान श्री राधा के रूप को नित्य हर्षपूर्वक निहारते रहते हैं।

