(कवित्त)
जोग-जप-संजम-समाधि-भुक्ति-मुक्ति-सुख,
सपने हू मीत, तू न आंख तर लावैगौ। [1]
'सुन्दर श्याम' रूप-रस-राग-गुन-सागर हैं,
बाँके बिहारी, सो अनन्य निधि पावैगौ॥ [2]
नीकी, नित नूतन, मन भावन छवि देखि-देखि,
प्रेम कौ पवित्र जस झूम-झूम गावैगौ। [3]
आवैगौ जो पै तू सरनैं हरिदास जू की,
तेरौ चित्त नित्त रस-सिन्धु में समावैगौ॥ [4]
- श्री सुंदर श्याम गोस्वामी
हे मित्र, यदि तू बाँके बिहारी की अनन्य भक्ति करेगा तो तू सपने में भी योग, जप, संयम, समाधि, भुक्ति, एवं मुक्ति के सुख को नहीं निहारेगा। [1]
श्री बाँके बिहारी जी रूप, रस, राग एवं गुणों के अथाह सागर हैं, ऐसी अनन्य निधि को फिर तू निश्चित ही प्राप्त कर लेगा। [2]
श्री बाँके बिहारीजी की मधुर, नित्य नवीन एवं मन को भाने वाली छवि को निहार कर प्रेम के परम पवित्र यश में झूमेगा और गाएगा। [3]
श्री श्यामसुन्दर गोस्वामी कहते हैं कि यदि तू अनन्य नृप्ति स्वामी श्री हरिदास जी की शरण में आएगा तो तेरा चित्त नित्य ही रस के सिंधु में डूबेगा। [4]
जोग-जप-संजम-समाधि-भुक्ति-मुक्ति-सुख,
सपने हू मीत, तू न आंख तर लावैगौ। [1]
'सुन्दर श्याम' रूप-रस-राग-गुन-सागर हैं,
बाँके बिहारी, सो अनन्य निधि पावैगौ॥ [2]
नीकी, नित नूतन, मन भावन छवि देखि-देखि,
प्रेम कौ पवित्र जस झूम-झूम गावैगौ। [3]
आवैगौ जो पै तू सरनैं हरिदास जू की,
तेरौ चित्त नित्त रस-सिन्धु में समावैगौ॥ [4]
- श्री सुंदर श्याम गोस्वामी
हे मित्र, यदि तू बाँके बिहारी की अनन्य भक्ति करेगा तो तू सपने में भी योग, जप, संयम, समाधि, भुक्ति, एवं मुक्ति के सुख को नहीं निहारेगा। [1]
श्री बाँके बिहारी जी रूप, रस, राग एवं गुणों के अथाह सागर हैं, ऐसी अनन्य निधि को फिर तू निश्चित ही प्राप्त कर लेगा। [2]
श्री बाँके बिहारीजी की मधुर, नित्य नवीन एवं मन को भाने वाली छवि को निहार कर प्रेम के परम पवित्र यश में झूमेगा और गाएगा। [3]
श्री श्यामसुन्दर गोस्वामी कहते हैं कि यदि तू अनन्य नृप्ति स्वामी श्री हरिदास जी की शरण में आएगा तो तेरा चित्त नित्य ही रस के सिंधु में डूबेगा। [4]

