(राग केदारो)
नाँचत गोपाल वनैं नटवर वपु काछैं।
गावति गति मिलवत अति, राधा के पाछैं॥ [1]
किंकिनि कंकन नूपुर धुनि, ताल मृदंग सोहैं।
मन्दहाँस भ्रु-विलास सैंननि मन-मोहैं॥ [2]
तरुवर गिरिवर मृग नाद वान पोहैं।
वृंदारक-वृंद-वधू तारक विधु मोहैं॥ [3]
समीर नीर पंगु भयौ, बालक न पय प्यावैं।
व्यास सकल-जीव-जंतु नाद स्वाद ज्यावैं॥ [4]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (167)
श्रीकृष्ण कमर में काछिनी बांध कर नटवर का रूप धारण कर नृत्य कर रहे हैं। वह गान कर रहे हैं और श्री राधा के पीछे उनकी तेज गति से मेल खाते हुए नृत्य कर रहे हैं। [1]
काछिनी, एवं पायल की झनझनाहट के संग मृदंग की सुंदर ताल की ध्वनि आकर्षक लग रही है। मंद मंद मुस्कुराहट के संग सुंदर भृकुटी विलास सब के मन को चुरा रही है। [2]
वृक्ष, गिरी एवं हिरण भी राग से मोहित हो रहे हैं। वृंदावन की युवतियां ही नहीं किन्तु तारे और चंद्रमा भी मोहित हो रहे हैं। [3]
हवा एवं पानी भी गतिहीन हो गए हैं एवं समस्त बालक अपना दूध पीना बंद कर रहे हैं। श्री हरिराम व्यास कहते हैं, "इस संगीत के रस से सारी सृष्टि समाहित हो रही है।" [4]
नाँचत गोपाल वनैं नटवर वपु काछैं।
गावति गति मिलवत अति, राधा के पाछैं॥ [1]
किंकिनि कंकन नूपुर धुनि, ताल मृदंग सोहैं।
मन्दहाँस भ्रु-विलास सैंननि मन-मोहैं॥ [2]
तरुवर गिरिवर मृग नाद वान पोहैं।
वृंदारक-वृंद-वधू तारक विधु मोहैं॥ [3]
समीर नीर पंगु भयौ, बालक न पय प्यावैं।
व्यास सकल-जीव-जंतु नाद स्वाद ज्यावैं॥ [4]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (167)
श्रीकृष्ण कमर में काछिनी बांध कर नटवर का रूप धारण कर नृत्य कर रहे हैं। वह गान कर रहे हैं और श्री राधा के पीछे उनकी तेज गति से मेल खाते हुए नृत्य कर रहे हैं। [1]
काछिनी, एवं पायल की झनझनाहट के संग मृदंग की सुंदर ताल की ध्वनि आकर्षक लग रही है। मंद मंद मुस्कुराहट के संग सुंदर भृकुटी विलास सब के मन को चुरा रही है। [2]
वृक्ष, गिरी एवं हिरण भी राग से मोहित हो रहे हैं। वृंदावन की युवतियां ही नहीं किन्तु तारे और चंद्रमा भी मोहित हो रहे हैं। [3]
हवा एवं पानी भी गतिहीन हो गए हैं एवं समस्त बालक अपना दूध पीना बंद कर रहे हैं। श्री हरिराम व्यास कहते हैं, "इस संगीत के रस से सारी सृष्टि समाहित हो रही है।" [4]

