(राग विहागरौ)
तिहारौ तौ परयौ है मान को सुभाव ।
तुम्हरी खोट के इनकी, कहियत कौन करे यह न्याव ॥ [1]
ये तो तिहारे रूप रस लोभी, मुख जोवत दिन जाव ।
छिन में रस बेरस करि डारत, को पकरैं कर बाव ॥ [2]
समझि देख राधे मन माँही, बिन पानी की नाव ।
श्री रसिकबिहारी रस बस, कीनें अपनें अपनें दाव ॥ [3]
- श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (11)
प्रिया प्रियतम एक दूसरे को निहार रहे हैं । इतने में श्री राधा मान कर लेती हैं । ऐसा सूक्ष्म मान हुआ है कि कुछ समझ ही नहीं आ रहा, कटाक्ष में ही मान हो गया है । इतने में एक सखी श्री राधा से कहती है:
हे राधे, तुम्हारा तो मान का स्वभाव ही है । तुम्हारे से त्रुटि हुई कि प्रियतम से यह मेरी समझ में ही नहीं आ रहा । [1]
प्रियतम [कृष्ण] तो तुम्हारे रूप के रस के ऐसे लोभी हैं कि तुम्हें निहारते निहारते पूरा दिन कैसे व्यतीत हो जाये इन्हें कुछ पता ही नहीं पड़ता । यह भला क्यों तुम्हें रुष्ट करेंगे क्योंकि तुम्हारे मान करते ही रस मानो बेरस हो पड़ा है । [2]
हे राधे, एक बार अपने मन में विचार कर लो क्योंकि तुम तो बिना पानी के ही नाव चला देती हो । (सखी की बात सुनकर कुछ प्रिया जी मुस्कुरा उठी) । हे रसिक बिहारी [कृष्ण], अब प्रिया जी का रूख कुछ बदल रहा है, अब तुम अपने दांव लगाकर प्राण प्यारी को मना लो । [3]
तिहारौ तौ परयौ है मान को सुभाव ।
तुम्हरी खोट के इनकी, कहियत कौन करे यह न्याव ॥ [1]
ये तो तिहारे रूप रस लोभी, मुख जोवत दिन जाव ।
छिन में रस बेरस करि डारत, को पकरैं कर बाव ॥ [2]
समझि देख राधे मन माँही, बिन पानी की नाव ।
श्री रसिकबिहारी रस बस, कीनें अपनें अपनें दाव ॥ [3]
- श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (11)
प्रिया प्रियतम एक दूसरे को निहार रहे हैं । इतने में श्री राधा मान कर लेती हैं । ऐसा सूक्ष्म मान हुआ है कि कुछ समझ ही नहीं आ रहा, कटाक्ष में ही मान हो गया है । इतने में एक सखी श्री राधा से कहती है:
हे राधे, तुम्हारा तो मान का स्वभाव ही है । तुम्हारे से त्रुटि हुई कि प्रियतम से यह मेरी समझ में ही नहीं आ रहा । [1]
प्रियतम [कृष्ण] तो तुम्हारे रूप के रस के ऐसे लोभी हैं कि तुम्हें निहारते निहारते पूरा दिन कैसे व्यतीत हो जाये इन्हें कुछ पता ही नहीं पड़ता । यह भला क्यों तुम्हें रुष्ट करेंगे क्योंकि तुम्हारे मान करते ही रस मानो बेरस हो पड़ा है । [2]
हे राधे, एक बार अपने मन में विचार कर लो क्योंकि तुम तो बिना पानी के ही नाव चला देती हो । (सखी की बात सुनकर कुछ प्रिया जी मुस्कुरा उठी) । हे रसिक बिहारी [कृष्ण], अब प्रिया जी का रूख कुछ बदल रहा है, अब तुम अपने दांव लगाकर प्राण प्यारी को मना लो । [3]

