आनंद अगाधा लहै साधा सुख सेवत ही - श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, हरि पद संग्रह (69)

आनंद अगाधा लहै साधा सुख सेवत ही - श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, हरि पद संग्रह (69)

(कवित्त)
आनंद अगाधा लहै साधा सुख सेवत ही,
करत अराधा असरन के सरन हैं। [1]
प्रीतम की प्यारी सुकुवारी सब-गुन-निधि,
जाको नाम लेत मुद-मंगल-करन हैं॥ [2]
करत ही ध्यान उर हरत कलेस सब,
चरन सरोज दुख-दंद के दरन हैं। [3]
आसरो अनन्य गहिए रे मन मेरे सदा,
राधा महारानी सब बाधा की हरन हैं॥ [4]

- श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, हरि पद संग्रह (69)

जिनकी सेवा करके अगाध अनन्द की प्राप्ति होती है; जिनकी आराधना करने से अशरणों को भी शरण मिलती है (अथवा जो श्री कृष्ण समस्त अशरणों को शरण देते हैं वे भी श्री राधा की आराधना करते हैं)। [1]

जो श्री श्याम सुंदर की प्राण प्यारी हैं, जो नित्य सुकुमार अवस्था में ही रहती हैं, जो समस्त गुणों की निधि हैं, जिनका नाम लेना आनंदप्रद एवं मंगलमय है। [2]

जिनका ध्यान करने से समस्त कलेशों का हरण होता है, जिनके कोमल चरण कमल समस्त दुखों के द्वन्द को समाप्त करते हैं। [3]

हे मेरे मन, तू केवल अनन्य रूप से ऐसी श्री राधा महारानी का आश्रय ग्रहण कर जो समस्त बाधाओं का हरण करने वाली हैं। [4]