अहो कुँवरि बर लाड़िली करुणा सिंधु अपार - श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (4)

अहो कुँवरि बर लाड़िली करुणा सिंधु अपार - श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (4)

अहो कुँवरि बर लाड़िली करुणा सिंधु अपार ।
तुम बिन नहिं मेरौ कोऊ कहूँ पुकारि पुकार ॥ [1]
कहूँ पुकारि पुकार सुनौ दै काननि प्यारी ।
तुम दाता तिहुँ लोक महा हूँ दीन भिखारी ॥ [2]
देउ यहै वरदान रहूँ पद पंकज सरना ।
और मिटै जग द्वन्द्व तिमिर भ्रम जनमनि मरना॥ [3]

- श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (4)

हे अपार करुणा की सिंधु लाड़िली [श्री राधा], मैं पुकार पुकार कर कहता हूँ कि “तुम बिन मेरा कोई नहीं है” ।  [1]

हे प्यारी! कृपया मेरी विनती सुनिए। तुम तीनों लोकों की दाता हूँ और मैं अति पतित भिखारी हूँ । [2]

आप मुझे ऐसा वर दीजिए कि मैं आपके चरणकमलों की अनन्य शरण में सदैव रहूं जिनकी [चरणों] कृपा से समस्त द्वन्द एवं अज्ञान रूपी अंधकार का सदा सदा को नाश हो जाए । [3]