(सवैया)
दिखाना न था नित नेह नया, हमें प्रेम के फंद फंसाना न था। [1]
बिन जागे वियोग विरह की व्यथा, दिल से दिल भूल मिलाना न था॥ [2]
हरे कृष्ण न सींचना था तो कृपा, अनुराग का बाग लगाना न था। [3]
बिन दाम गुलाम बनाना न था, यदि प्रीत की रीत निभाना न था॥ [4]
- श्री हरे कृष्ण जी
एक भक्त अपने प्रिय ठाकुर श्री बाँके बिहारी से कटाक्ष करता हुआ कहता है:
यदि प्रेम निभाना नहीं था, तो प्रतिदिन नया प्रेम दिखाकर हमें प्रेम-जाल में क्यों फँसाया? [1]
यदि अंत में वियोग ही देना था, तो पहले हृदय से हृदय को मिलाना ही क्यों था? [2]
यदि प्रेम-उपवन को सींचना ही नहीं था, तो हमारे हृदय में कृपा और अनुराग का यह बाग लगाना ही क्यों था? [3]
हे बाँके बिहारी! यदि प्रेम की मर्यादा निभानी ही नहीं थी, तो बिना मूल्य के हमें अपना ग़ुलाम बनाना ही क्यों था? [4]
दिखाना न था नित नेह नया, हमें प्रेम के फंद फंसाना न था। [1]
बिन जागे वियोग विरह की व्यथा, दिल से दिल भूल मिलाना न था॥ [2]
हरे कृष्ण न सींचना था तो कृपा, अनुराग का बाग लगाना न था। [3]
बिन दाम गुलाम बनाना न था, यदि प्रीत की रीत निभाना न था॥ [4]
- श्री हरे कृष्ण जी
एक भक्त अपने प्रिय ठाकुर श्री बाँके बिहारी से कटाक्ष करता हुआ कहता है:
यदि प्रेम निभाना नहीं था, तो प्रतिदिन नया प्रेम दिखाकर हमें प्रेम-जाल में क्यों फँसाया? [1]
यदि अंत में वियोग ही देना था, तो पहले हृदय से हृदय को मिलाना ही क्यों था? [2]
यदि प्रेम-उपवन को सींचना ही नहीं था, तो हमारे हृदय में कृपा और अनुराग का यह बाग लगाना ही क्यों था? [3]
हे बाँके बिहारी! यदि प्रेम की मर्यादा निभानी ही नहीं थी, तो बिना मूल्य के हमें अपना ग़ुलाम बनाना ही क्यों था? [4]

