गेरा मासे कौ गुरू, ताकौ सिष सब कोय ।
ताकी आस उपासना, करै निरंतर सोय ॥ [1]
करै निरंतर सोय, और नहिं आवै मन में ।
बाल वृद्ध, नर नारि, सुभाइक तृष्ना धन में ॥ [2]
भगवत रसिक बिहाय, कियौ सबके उर डेरा ।
गेही कहा बिरक्त, मिले पावै सुख गेरा ॥ [3]
- श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (22)
जो ग्यारह मासे भर (शुद्ध चाँदी) का बना है (अर्थात् रूपया, धन) वही सारे संसार का गुरु है, सब उसी धन के चेले चपाटे हैं । [1]
जो कुछ भी आराधना उपासना संसार में चल रही है, वह भी इस धन की आशा से ही है। इसके अतिरिक्त और कुछ (श्रीहरि के दर्शनों की लालसा, उनके प्रति प्रेम आदि की तो बात ही मन में नहीं आती) । बालक, वृद्ध, स्त्री, पुरुष सबकी धन में स्वाभाविक तृष्णा है । [2]
श्री भगवत रसिक जी कहते हैं कि भगवान के प्रेमी भक्तों के अतिरिक्त और सबके हृदय में यह तृष्णा डेरा डाले बैठी है। क्या गृहस्थ और क्या विरक्त, सबका मन धन की प्राप्ति से ही सुख का अनुभव करता है । [3]
ताकी आस उपासना, करै निरंतर सोय ॥ [1]
करै निरंतर सोय, और नहिं आवै मन में ।
बाल वृद्ध, नर नारि, सुभाइक तृष्ना धन में ॥ [2]
भगवत रसिक बिहाय, कियौ सबके उर डेरा ।
गेही कहा बिरक्त, मिले पावै सुख गेरा ॥ [3]
- श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (22)
जो ग्यारह मासे भर (शुद्ध चाँदी) का बना है (अर्थात् रूपया, धन) वही सारे संसार का गुरु है, सब उसी धन के चेले चपाटे हैं । [1]
जो कुछ भी आराधना उपासना संसार में चल रही है, वह भी इस धन की आशा से ही है। इसके अतिरिक्त और कुछ (श्रीहरि के दर्शनों की लालसा, उनके प्रति प्रेम आदि की तो बात ही मन में नहीं आती) । बालक, वृद्ध, स्त्री, पुरुष सबकी धन में स्वाभाविक तृष्णा है । [2]
श्री भगवत रसिक जी कहते हैं कि भगवान के प्रेमी भक्तों के अतिरिक्त और सबके हृदय में यह तृष्णा डेरा डाले बैठी है। क्या गृहस्थ और क्या विरक्त, सबका मन धन की प्राप्ति से ही सुख का अनुभव करता है । [3]

