(राग कल्याण एवं राग विहाग)
लाल की नींद झपत अँखियाँ ।
खंजन सुत अरबरत उड़न मनु उल्हीं नई पँखियाँ ॥ [1]
प्यारी रूप छकीं कैं घूमंत मतवारी लखियाँ ।
वृंदावन हित रूप रसासव पिवत जिवत लखियाँ ॥ [2]
- श्री हित वृंदावन दास
श्री लालजी (कृष्ण) के नेत्र नींद में लग रहे हैं। उनके नेत्र मानो खंजन पक्षी की तरह दिखते हैं एवं ऐसे झपकते हैं जैसे एक नवजात पक्षी उड़ने की कोशिश में अपने नये पंखों से फड़फड़ाता है । [1]
उनके नेत्र अपनी प्यारी श्री राधा के रूप में छके घूमते हैं एवं मतवारे से प्रतीत होते हैं । श्री हित वृंदावन दास कहते हैं, श्री लाल जी के नेत्र श्री राधा रूपरस का ही अनन्य पान करते हुए जीवित रहते हैं । [2]
लाल की नींद झपत अँखियाँ ।
खंजन सुत अरबरत उड़न मनु उल्हीं नई पँखियाँ ॥ [1]
प्यारी रूप छकीं कैं घूमंत मतवारी लखियाँ ।
वृंदावन हित रूप रसासव पिवत जिवत लखियाँ ॥ [2]
- श्री हित वृंदावन दास
श्री लालजी (कृष्ण) के नेत्र नींद में लग रहे हैं। उनके नेत्र मानो खंजन पक्षी की तरह दिखते हैं एवं ऐसे झपकते हैं जैसे एक नवजात पक्षी उड़ने की कोशिश में अपने नये पंखों से फड़फड़ाता है । [1]
उनके नेत्र अपनी प्यारी श्री राधा के रूप में छके घूमते हैं एवं मतवारे से प्रतीत होते हैं । श्री हित वृंदावन दास कहते हैं, श्री लाल जी के नेत्र श्री राधा रूपरस का ही अनन्य पान करते हुए जीवित रहते हैं । [2]

