पुरुष भाव छूटै नहीं, मन में बस रही जोई ।
सखीभाव तब जानिए, निर्विकार तन होई ॥
- श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (12)
सखी भाव एक दिव्य भाव है जिसका प्रादुर्भाव बिना निर्विकार हुए नहीं होता, जहाँ जीव लौकिक कर्मों एवं संबंधों से सर्वप्रथम अनासक्त हो जाता है, जहाँ वह न तो स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक।
सखीभाव तब जानिए, निर्विकार तन होई ॥
- श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (12)
सखी भाव एक दिव्य भाव है जिसका प्रादुर्भाव बिना निर्विकार हुए नहीं होता, जहाँ जीव लौकिक कर्मों एवं संबंधों से सर्वप्रथम अनासक्त हो जाता है, जहाँ वह न तो स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक।

