बिहारिनि जीवनि मेरी हो - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणि, सहज सुख (91)

बिहारिनि जीवनि मेरी हो - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणि, सहज सुख (91)

(दोहा)
परमाधारिनि प्रेयसी, स्यामा सहज स्वरूप ।
अहो बिहारिनि बलि सदा, जीवनि प्रान अनूप ॥


(पद)
बिहारिनि जीवनि मेरी हो ।
सदा प्रान प्रतिपालन हौं बलि जाऊं तेरी हो ॥ [1]
परमाधार प्रेयसी स्यामा सहज स्वरूपा एरी हो ।
श्रीहरिप्रिया आस अवलम्बनी तो पद केरी हो ॥ [2]

- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (91)

श्री लाल जी (श्री कृष्ण) के वचन श्री राधा के प्रति :

(दोहा)
हे मेरी परम आधार-रूपा प्यारीजू! आपका स्वाभाविक स्वरूप सदा “श्यामा” अर्थात् पूर्ण किशोरावस्था वाला (16 वर्ष की नवयुवती) रहता है। हे विहारिणीजू! मैं आपकी बलिहारी जाऊँ, आप मुझको इस प्रकार से सदा जीवन प्रदान करती रहती हो जिसकी कोई उपमा नहीं है।

(पद)
हे विहारिणी ! आप मेरी जीवन स्वरूपा हो । आप मेरे प्राणों की सदा रक्षा करती रहती हो, मैं आपकी बलिहारी जाऊं । [1]

आप स्वभाव से ही “श्यामा”” अर्थात पूर्ण किशोर अवस्था प्राप्त हो अतः आप मेरी परम आधार स्वरूपा प्यारी हो । हे श्रीहरि की प्रिया अर्थात प्रियाजू ! मुझको तो एक मात्र आपके चरण कमलों की ही आशा और सहारा है । [2]