(कवित्त)
संतन की संगति पुनीत जहाँ निस - दिन,
जमुना- जल न्हैहौ जस गैहौ दधिदानी कौ। [1]
जुगल-बिहारी कौ सुजस त्रय-ताप-हारी,
श्रवननि पान करौ रसिकन की बानी कौ॥ [2]
बंसी अली संग रस-रंग अब लहौ कोउ,
मंगल को करन सरन राधा रानी कौ। [3]
कुँवरि ‘किसोरी’ मेरे आस एक रावरी ही,
कृपा करि दीजे बास निज रजधानी कौ॥ [4]
- श्री किशोरी अलि
जहाँ संतों की शुभ संगति दिन-रात सुलभ होती है, जहाँ यमुनाजी के पवित्र जल में स्नान का सौभाग्य प्राप्त होता है, और जहाँ दही का दान लेने वाले श्री कृष्ण का यशोगान निरंतर गूँजता है। [1]
संतन की संगति पुनीत जहाँ निस - दिन,
जमुना- जल न्हैहौ जस गैहौ दधिदानी कौ। [1]
जुगल-बिहारी कौ सुजस त्रय-ताप-हारी,
श्रवननि पान करौ रसिकन की बानी कौ॥ [2]
बंसी अली संग रस-रंग अब लहौ कोउ,
मंगल को करन सरन राधा रानी कौ। [3]
कुँवरि ‘किसोरी’ मेरे आस एक रावरी ही,
कृपा करि दीजे बास निज रजधानी कौ॥ [4]
- श्री किशोरी अलि
जहाँ संतों की शुभ संगति दिन-रात सुलभ होती है, जहाँ यमुनाजी के पवित्र जल में स्नान का सौभाग्य प्राप्त होता है, और जहाँ दही का दान लेने वाले श्री कृष्ण का यशोगान निरंतर गूँजता है। [1]
जहाँ श्री युगल बिहारी के मधुर यश के गान से तीनों प्रकार के ताप (दैहिक, दैविक और भौतिक) दूर हो जाते हैं, और जहाँ रसिक जनों की मधुर वाणी सुनने को मिलती है। [2]
जहाँ बंशीधारी श्रीकृष्ण के संग रस और आनंद का अनुभव होता है, और जहाँ परम मंगलमयी श्री राधा रानी की कृपा-शरण प्राप्त होती है। [3]
श्री किशोरी अलि जी प्रार्थना करते हैं: हे मेरी राधा किशोरी! मेरी एकमात्र आकांक्षा है कि अपनी कृपा से आप मुझे अपनी दिव्य राजधानी, श्री वृंदावन में वास का सौभाग्य प्रदान करें। [4]

