श्री वृंदाविपिन सर्व सुखसार ।
मेरे तौ दूजौ नहिं कोऊ, जिहीं प्रान-जीवन-आधार ॥ [1]
सेवहूँ श्री राधा-माधव पद, गाऊं तिनकौ नित्य बिहार ।
पढ़ि - पढ़ि पोथी त्याग दई, मन पायौ नहीं तत्व को पार ॥ [2]
जाको ब्रह्म कहत वेदांती, सो मेरे प्यारे को प्यार ।
'श्री राधा प्रिया' निरख राजधानी, रजरानी रखि हिय में धार ॥ [3]
- श्री राधा प्रिया जी (राधिकानाथ जी)
श्री वृंदावन सर्व सुख का सार है । मेरा इस वृन्दावन धाम के अतिरिक्त अन्य कोई दूसरा मेरा प्राण जीवन आधार नहीं है । [1]
मैं वृंदावन में, दिव्य युगल श्री राधा माधव के चरण कमलों की सेवा करता हूं, और उनके अति दिव्य रस नित्य विहार का अवलोकन करता हूँ । विभिन्न ग्रंथों को पढ़ पढ़ कर मैंने त्याग दिया है क्योंकि यह परम तत्व (नित्य विहार) के रस बरसाने में असमर्थ हैं । [2]
वेदांतियों द्वारा जिसे 'ब्रह्म' कहा जाता है, वह मेरे प्यारे का प्यार है। श्री राधा प्रिया [राधिकानाथ] जी कहते हैं कि अब तो वे केवल रजरानी (वृंदावन की रज) की महिमा को ह्रदय में धारण कर अनन्य रूप से श्री श्यामा श्याम की निज राजधानी श्री धाम वृंदावन को ही निरखते हैं । [3]
मेरे तौ दूजौ नहिं कोऊ, जिहीं प्रान-जीवन-आधार ॥ [1]
सेवहूँ श्री राधा-माधव पद, गाऊं तिनकौ नित्य बिहार ।
पढ़ि - पढ़ि पोथी त्याग दई, मन पायौ नहीं तत्व को पार ॥ [2]
जाको ब्रह्म कहत वेदांती, सो मेरे प्यारे को प्यार ।
'श्री राधा प्रिया' निरख राजधानी, रजरानी रखि हिय में धार ॥ [3]
- श्री राधा प्रिया जी (राधिकानाथ जी)
श्री वृंदावन सर्व सुख का सार है । मेरा इस वृन्दावन धाम के अतिरिक्त अन्य कोई दूसरा मेरा प्राण जीवन आधार नहीं है । [1]
मैं वृंदावन में, दिव्य युगल श्री राधा माधव के चरण कमलों की सेवा करता हूं, और उनके अति दिव्य रस नित्य विहार का अवलोकन करता हूँ । विभिन्न ग्रंथों को पढ़ पढ़ कर मैंने त्याग दिया है क्योंकि यह परम तत्व (नित्य विहार) के रस बरसाने में असमर्थ हैं । [2]
वेदांतियों द्वारा जिसे 'ब्रह्म' कहा जाता है, वह मेरे प्यारे का प्यार है। श्री राधा प्रिया [राधिकानाथ] जी कहते हैं कि अब तो वे केवल रजरानी (वृंदावन की रज) की महिमा को ह्रदय में धारण कर अनन्य रूप से श्री श्यामा श्याम की निज राजधानी श्री धाम वृंदावन को ही निरखते हैं । [3]

