संयोगस्य वियोगस्य - श्री वंशीअलि, श्री राधा सिद्धांत (96)

संयोगस्य वियोगस्य - श्री वंशीअलि, श्री राधा सिद्धांत (96)

संयोगस्य वियोगस्य नहि तत्र विनिश्चिति ।
द्वाभ्यां भिन्नो रसोस्माकं स्थितश्चोभय रूपतः ॥

- श्री वंशीअलि, श्री राधा सिद्धांत (96)

जहां संयोग और वियोग का निश्चय ही न हो सके, इन दोनों से भिन्न स्थिति जहां हो, और दोनों (संयोग एवं वियोग) जहां एक रूप होकर रहते हों, वही अद्बुत रस नित्य विहार है ।