कालिंदी के तीर नीर-निकट कदंब कुंज - ताज बेगम

कालिंदी के तीर नीर-निकट कदंब कुंज - ताज बेगम

(कवित्त)
कालिंदी के तीर नीर-निकट कदंब कुंज,
मन कछु इच्छा कीनी सेज सरोजन की। [1]
अंतर के यामी, कामी, कँवल के दल लेके,
रची सेज तहाँ शोभा कहा कहौ तिनकी॥ [2]
तिहिं समै ‘ताज’ प्रभु दंपति मिले की छवि,
बरन सकत कोऊ नाही वाही छिनकी। [3]
राधे की चटक देखे, अँखियाँ अटक रही,
मीन को मटक नाहिं साजत वा दिन की॥ [4]

- ताज़ बेगम (ताज़ बीबी)

कदंब की कुंजों के निकट, यमुना के किनारे, मन में एक ऐसी इच्छा हुई कि सुंदर कमल के फूलों से सुसज्जित एक सेज हो। [1]

ह्रदय के भावों को जानकर उसी समय इस कामना को पूर्ण करने के लिए कमल के विभिन्न फूलों से एक सेज रची गई जिसकी शोभा कहते नहीं बनती। [2]

उस समय दिव्य दंपति (युगल सरकार श्री राधा कृष्ण) का मिलन उस सेज पर हुआ जिसकी छवि ऐसी अनुपम थी जिसका वर्णन एक क्षण को भी किसी के लिए भी करना असंभव है। [3]

श्री राधा की चटक को देख कर अखियाँ ऐसी अटक रही हैं मानो मीन की मटकन भी उस दिन की छवि के समक्ष हेय लग रही है। [4]