श्री वृंदावन स्वामिनी करि सुदृष्टि इहि ओर - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (10)

श्री वृंदावन स्वामिनी करि सुदृष्टि इहि ओर - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (10)

श्री वृंदावन स्वामिनी, करि सुदृष्टि इहि ओर ।
वृष्टि करौ अनुराग की, कृपा कटाक्षन कोर ॥

- श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (10)

हे वृंदावन की महारानी, श्री राधा! कृपा करके मेरी ओर सुदृष्टि डालिए और अपने कृपा-कटाक्ष की कोर से अनुराग-रस की वर्षा कर दीजिए।