ऐसी न देखी सुनी सजनी - श्री पद्माकर

ऐसी न देखी सुनी सजनी - श्री पद्माकर

(सवैया)
ऐसी न देखी सुनी सजनी, धनी बाढ़त जात बियोग की बाधा । [1]
त्यों ‘पद्माकर’ मोहन को तब तें, कल है न कहूँ पल आधा ॥ [2]
लाल गुलाल घलाघल में, दृग ठोकर दै गयी रूप अगाधा । [3]
कै गई कै गई चेटक-सी, मन लै गई लै गई लै गई राधा ॥ [4]

- श्री पद्माकर

किसी स्त्री के वियोग में इस प्रकार की निरंतर बढ़ती हुई अशांति मैंने पहले कभी न तो देखी और न ही कभी सुनी। [1]

श्री पद्माकर जी कहते हैं कि राधा से बिछुड़ने पर श्रीकृष्ण को आधे क्षण के लिए भी शांति नहीं मिल रही है। [2]

लाल गुलाल की बौछार में उस अगाध रूपवाली श्री राधा ने एक दृष्टि से उसे घायल कर दिया है, जिससे वह गुलाल सर्वत्र उड़कर व्याप्त हो गया है, अर्थात श्रीकृष्ण का सर्वांग प्रेम के रंग से रंजित हो गया है। [3]

श्री राधा वहाँ से कहाँ ग़ायब हो गई, उन्होंनें तो श्रीकृष्ण का मन ही अपने साथ उड़ा लिया। [4]