सदा एक रस अखंडित, आदि अनादि अनूप ।
कोटि कल्प बीतत नहीं जानत, विहरत जुगल स्वरूप ॥
- श्री सूरदास, सूर सागर
दिव्य युगल श्री राधा-कृष्ण का नित्य-विहार सदा एकरस और अखंड है—जिसका न आदि है, न अंत। श्री युगल स्वरूप (श्री राधा-कृष्ण) इस रस में मग्न होकर ऐसा विहार करते हैं कि करोड़ों कल्प बीत जाने पर भी उन्हें समय का आभास नहीं होता।
कोटि कल्प बीतत नहीं जानत, विहरत जुगल स्वरूप ॥
- श्री सूरदास, सूर सागर
दिव्य युगल श्री राधा-कृष्ण का नित्य-विहार सदा एकरस और अखंड है—जिसका न आदि है, न अंत। श्री युगल स्वरूप (श्री राधा-कृष्ण) इस रस में मग्न होकर ऐसा विहार करते हैं कि करोड़ों कल्प बीत जाने पर भी उन्हें समय का आभास नहीं होता।

