अब पौढ़नको समय भयो - श्री बनी ठनी जी

अब पौढ़नको समय भयो - श्री बनी ठनी जी

(राग विहाग)
अब पौढ़नको समय भयो ।
इत ढुरगई द्रुमनकी छैयाँ उत ढुर चंद गयो ॥ [1]
पौढ़ रहे दो सुखद सेज पर बाढ़त रंग नयो ।
रसिक बिहारी बिहारिन दोउ पौढे यह सुख दृगन लयो ॥ [2]

- श्री बनी ठनी जी

अब पौढ़ने को समय आगया है, एक तरफ़ वृक्षों की छाया ढुर गई और दूसरी ओर चन्द्र ढुर गया है । [1]

दोनों श्यामा श्याम सुखद सेज पर पौढ़े हैं, जिसका सुख श्री बनी ठनी जी अपनी आँखों से निहार रही हैं । [2]