श्रीब्रजमोहन -माधुरी, रही नैन-मन छाय ।
अद्भुत रस आनंदघन, प्यासै बढ़ति अघाय ॥
- श्री आनंदघन, घनानंद ग्रंथावली, ब्रजविलास (69)
ब्रज में मोहन श्रीकृष्ण की माधुरी नयनों और मन में नित्य छाई रहती है। वे ऐसा अद्भुत रस बरसाते हैं कि जितना पान किया जाए, उतनी ही प्यास बढ़ती जाती है; तृप्ति नहीं मिलती।
अद्भुत रस आनंदघन, प्यासै बढ़ति अघाय ॥
- श्री आनंदघन, घनानंद ग्रंथावली, ब्रजविलास (69)
ब्रज में मोहन श्रीकृष्ण की माधुरी नयनों और मन में नित्य छाई रहती है। वे ऐसा अद्भुत रस बरसाते हैं कि जितना पान किया जाए, उतनी ही प्यास बढ़ती जाती है; तृप्ति नहीं मिलती।

