(राग सारंग)
स्वस्ति श्री वृंदावन सर्वोपर राजमांन,
सकल सुख निधान जहां विहरत पिय प्यारी। [1]
महा मृदुल सेज हेज हिली मिले हुलास,
कमल कुंज आस पास मंजु मुदित मधु लिहारी॥ [2]
गावत सारंग उदित कोक कला अंग संग,
निरखि निरखि होत पंग संगनि सहचारी। [3]
रसिक रूप रास रवन नवन केलि कवन करत,
भरत अंक ह्वै निसंक मदन कदन कारी॥ [4]
- श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (36)
मंगलकारी श्री धाम वृंदावन सर्वोपरि विराजमान है जहां सकल सुख निधान प्रिया प्रियतम (श्री राधा कृष्ण) विराजमान हैं। [1]
जहां महामृदुल कमल की सेज पर हर्षोल्लास से युक्त, नित्य मिले हुए प्रिया प्रियतम मृदुल कुंजों में विराजमान हैं। [2]
जहां सहचरियाँ रस भरी रीति से सारंग राग गान कर प्रिया प्रियतम के अंगों में प्रेम का संचार कर रही हैं, जिसको निरख निरख कर सहचरियाँ पंगु हो रही हैं। [3]
श्री रूप रसिक जी कहते हैं कि रास शिरोमणि श्री प्रिया प्रियतम जब वृंदावन की कुंजों में एक दूसरे को अंकों में भरकर निशंख रूप से नवल केली करते हैं तो मानो साक्षात कामदेव का ही संपूर्ण रूप से हरण कर लेते हैं। [4]
स्वस्ति श्री वृंदावन सर्वोपर राजमांन,
सकल सुख निधान जहां विहरत पिय प्यारी। [1]
महा मृदुल सेज हेज हिली मिले हुलास,
कमल कुंज आस पास मंजु मुदित मधु लिहारी॥ [2]
गावत सारंग उदित कोक कला अंग संग,
निरखि निरखि होत पंग संगनि सहचारी। [3]
रसिक रूप रास रवन नवन केलि कवन करत,
भरत अंक ह्वै निसंक मदन कदन कारी॥ [4]
- श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (36)
मंगलकारी श्री धाम वृंदावन सर्वोपरि विराजमान है जहां सकल सुख निधान प्रिया प्रियतम (श्री राधा कृष्ण) विराजमान हैं। [1]
जहां महामृदुल कमल की सेज पर हर्षोल्लास से युक्त, नित्य मिले हुए प्रिया प्रियतम मृदुल कुंजों में विराजमान हैं। [2]
जहां सहचरियाँ रस भरी रीति से सारंग राग गान कर प्रिया प्रियतम के अंगों में प्रेम का संचार कर रही हैं, जिसको निरख निरख कर सहचरियाँ पंगु हो रही हैं। [3]
श्री रूप रसिक जी कहते हैं कि रास शिरोमणि श्री प्रिया प्रियतम जब वृंदावन की कुंजों में एक दूसरे को अंकों में भरकर निशंख रूप से नवल केली करते हैं तो मानो साक्षात कामदेव का ही संपूर्ण रूप से हरण कर लेते हैं। [4]

