देख्यो नेही नंदकिसोर ।
हाइ-हाइ दिन-रात बितावत, निरखत प्यारी ओर ॥ [1]
अँसुअन धारि ढरति धाराधरि, मारत श्वास झकोर ।
विछुरनि भरयौ रहत ‘वंशीअलि’, नाहिं कोऊ रौर ॥ [2]
- श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (38)
इस पद में नित्य विहार रस के संयोग एवं वियोग की एक साथ अवस्था की विचित्र दशा का वर्णन किया गया है । श्री वंशी अलि जी कहते हैं कि श्री लालजी की प्यारी जू से जैसे ही दृष्टि मिलती है, वे घायल होकर ‘हाय हाय’ करने लगते हैं । [1]
श्री प्रिया जू की तिरछी कटाक्ष का ऐसा असर उनपर होता है कि श्री कृष्ण के आंसुओं की धारा चलने लगती है, कंपन शुरू हो जाती है और निःश्वास से होने लगते हैं । नित्य श्री राधा के समीप होते हुए भी उन्हें ऐसा लगता है कि मैं अभी भी उनसे दूर हूँ, अत: उनकी नित्य श्री राधा के मिलन की लालसा बढ़ती रहती है । [2]
हाइ-हाइ दिन-रात बितावत, निरखत प्यारी ओर ॥ [1]
अँसुअन धारि ढरति धाराधरि, मारत श्वास झकोर ।
विछुरनि भरयौ रहत ‘वंशीअलि’, नाहिं कोऊ रौर ॥ [2]
- श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (38)
इस पद में नित्य विहार रस के संयोग एवं वियोग की एक साथ अवस्था की विचित्र दशा का वर्णन किया गया है । श्री वंशी अलि जी कहते हैं कि श्री लालजी की प्यारी जू से जैसे ही दृष्टि मिलती है, वे घायल होकर ‘हाय हाय’ करने लगते हैं । [1]
श्री प्रिया जू की तिरछी कटाक्ष का ऐसा असर उनपर होता है कि श्री कृष्ण के आंसुओं की धारा चलने लगती है, कंपन शुरू हो जाती है और निःश्वास से होने लगते हैं । नित्य श्री राधा के समीप होते हुए भी उन्हें ऐसा लगता है कि मैं अभी भी उनसे दूर हूँ, अत: उनकी नित्य श्री राधा के मिलन की लालसा बढ़ती रहती है । [2]

