कियौ सिंगार लाल प्यारी कौ - श्री रामराय, आदिवाणी (17)

कियौ सिंगार लाल प्यारी कौ - श्री रामराय, आदिवाणी (17)

कियौ सिंगार लाल प्यारी कौ निरखि-निरखि सहचरि मुसक्यानी ॥ [1]
मोर मुकट माथे श्रुति कुण्डल भाल तिलक तन मृगमद सानी । [2]
पीताम्बर पटका कटि उपटत हार हिये बनमाल सुहानी ॥ [3]
चिबुक विन्दु सामल कज्जल चखि रस ताम्बूल लालिमा खानी । [4]
मुरली कर जु देत मोहन की रामराय मति गती भुलानी ॥ [5]

- श्री रामराय जी, आदिवाणी (17)

श्री लालजी (श्री कृष्ण) ने श्री प्यारी जू का सुन्दर श्रृंगार किया है जिसका दर्शन कर सखियाँ मुस्कुरा रही हैं । [1]

श्री लालजी ने प्यारी के माथे पर मोर मुकुट, कानों में कुण्डल, भाल पर तिलक धारण कराया है एवं तन पर कस्तूरी का लेप लगाया है । [2]

कटी प्रदेश में पीताम्बर एवं गले में वनमाला धारण कराया है । [3]

लालजी ने प्यारी के चिबुक पर बिंदु लगाया है, नयन कमलों में काजल की रेख खींची है, मुख में ताम्बूल अर्पण किया है जिससे अधरों पर लालिमा छा गयी है । [4]

अंत में श्री लालजी ने प्यारी के हाथ में अपनी मुरली ही अर्पण कर दी जिसे देख कर श्री रामराय अपनी मति-गति भूल गए हैं । [5]