(राग कानरौ)
न्यांइरी ! तू अलकलडी ।
निसि वासर गिरिधरन लाल के, हृदे में रहति गडी ॥ [1]
तौही लों सुख जौलों समीपु रहै, एक निमिख भावत नाहिं घडी ।
कुँभनदास स्वामिनि राधा है, व्रज - जुवतिन मांझ बडी ॥ [2]
- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (271)
ही अलबेली राधिका, तू अलक लड़ी [लाड़ लड़ाने योग्य] है । तू तो नित्य प्रति श्री गिरिधल लाल [श्री कृष्ण] के ह्रदय में गड़ी रहती है । [1]
गिरिधर लाल नित्य ही तेरे समीप विराजते हैं और एक क्षण को भी तुम्हारे अतिरिक्त कहीं सुख नहीं पाते । श्री कुँभनदास जी कहते हैं कि श्री राधा ही उनकी स्वामिनी हैं जो ब्रज की समस्त युवतियों में चूड़ामणि हैं । [2]
न्यांइरी ! तू अलकलडी ।
निसि वासर गिरिधरन लाल के, हृदे में रहति गडी ॥ [1]
तौही लों सुख जौलों समीपु रहै, एक निमिख भावत नाहिं घडी ।
कुँभनदास स्वामिनि राधा है, व्रज - जुवतिन मांझ बडी ॥ [2]
- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (271)
ही अलबेली राधिका, तू अलक लड़ी [लाड़ लड़ाने योग्य] है । तू तो नित्य प्रति श्री गिरिधल लाल [श्री कृष्ण] के ह्रदय में गड़ी रहती है । [1]
गिरिधर लाल नित्य ही तेरे समीप विराजते हैं और एक क्षण को भी तुम्हारे अतिरिक्त कहीं सुख नहीं पाते । श्री कुँभनदास जी कहते हैं कि श्री राधा ही उनकी स्वामिनी हैं जो ब्रज की समस्त युवतियों में चूड़ामणि हैं । [2]

