जो कछु तुम चाहौ, करौ राधा-माधव! दोउ ।
तुम्हरे मन की सहज रुचि, चाह जु मेरी होउ ॥
- श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (14.3)
हे श्री राधा-माधव! आप दोनों युगल सरकार जो कुछ भी चाहें, वही करें। मेरी बस यही एकमात्र अभिलाषा है कि जो आपके मन की स्वाभाविक रुचि और इच्छा हो, वही मेरी भी चाह बन जाए (अर्थात् तुम्हारी इच्छा ही मेरी इच्छा हो जाए )।
तुम्हरे मन की सहज रुचि, चाह जु मेरी होउ ॥
- श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (14.3)
हे श्री राधा-माधव! आप दोनों युगल सरकार जो कुछ भी चाहें, वही करें। मेरी बस यही एकमात्र अभिलाषा है कि जो आपके मन की स्वाभाविक रुचि और इच्छा हो, वही मेरी भी चाह बन जाए (अर्थात् तुम्हारी इच्छा ही मेरी इच्छा हो जाए )।

