(राग जैजैवंती)
साँवरे की दृष्टि मानो प्रेम की कटारी है ॥
लागत बिहाल भई तनकी की सुधि गई,
मनहू में व्याप्यो प्रेम भई मतवारी है । [1]
चंद को चकोर चाहै दीपक पतंग जारै,
जल बिना मरै मीन ऐसी प्रीति प्यारी है ॥ [2]
सखी मिलि दोइ चारि सुनो री सयानी नारि,
उनको हौं नीके जानौं कुंज को बिहारी हैं । [3]
मोर का मुकट माथे छबि गिरधारी हैं,
माधुरी मूरति पर ‘मीरा’ बलिहारी है ॥ [4]
- श्री मीरा बाई
साँवरे श्री कृष्ण की दृष्टि मानो प्रेम का ख़ंजर है । यदि एक बार किसी को लग गई, तो वो तो बेहाल होकर तन मन की सुधि भुला कर प्रेम में मतवाला होकर घूमेगा । [1]
जिस प्रकार चन्द्र को चकोर चाहता है, जिस प्रकार पतंग दीपक की रोशनी की चाह में स्वयं को जला देता है, जिस प्रकार मछली पानी के बिना मर जाती है, इसी प्रकार का ही प्रेम उत्तम है । [2]
दो चार सखियाँ मिलकर आपस में कहती हैं कि हे सयानी नारी, वे ही केवल प्रेम करने योग्य हैं, वे कुंज बिहारी ही हैं । [3]
उनके माथे पर मोर मुकुट विराजमान है, उनकी छवि सुंदर है, उनकी माधुरी मूरत पर मीरा जी बलिहारी जाती हैं । [4]
साँवरे की दृष्टि मानो प्रेम की कटारी है ॥
लागत बिहाल भई तनकी की सुधि गई,
मनहू में व्याप्यो प्रेम भई मतवारी है । [1]
चंद को चकोर चाहै दीपक पतंग जारै,
जल बिना मरै मीन ऐसी प्रीति प्यारी है ॥ [2]
सखी मिलि दोइ चारि सुनो री सयानी नारि,
उनको हौं नीके जानौं कुंज को बिहारी हैं । [3]
मोर का मुकट माथे छबि गिरधारी हैं,
माधुरी मूरति पर ‘मीरा’ बलिहारी है ॥ [4]
- श्री मीरा बाई
साँवरे श्री कृष्ण की दृष्टि मानो प्रेम का ख़ंजर है । यदि एक बार किसी को लग गई, तो वो तो बेहाल होकर तन मन की सुधि भुला कर प्रेम में मतवाला होकर घूमेगा । [1]
जिस प्रकार चन्द्र को चकोर चाहता है, जिस प्रकार पतंग दीपक की रोशनी की चाह में स्वयं को जला देता है, जिस प्रकार मछली पानी के बिना मर जाती है, इसी प्रकार का ही प्रेम उत्तम है । [2]
दो चार सखियाँ मिलकर आपस में कहती हैं कि हे सयानी नारी, वे ही केवल प्रेम करने योग्य हैं, वे कुंज बिहारी ही हैं । [3]
उनके माथे पर मोर मुकुट विराजमान है, उनकी छवि सुंदर है, उनकी माधुरी मूरत पर मीरा जी बलिहारी जाती हैं । [4]

