जै राधे मेरी प्रान अधार ।
अद्भुत रंग रूप रस बरषत महा प्रेम अति सुख कौ सार ॥ [1]
सहज सनेही सहज आनंद निधि सहज रसिक प्रीतम उर हार ।
श्रीकुंजबिहारिनि ललितकिसोरी छिन छिन बिलसत नित्यबिहार ॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (8)
श्री राधे रानी की जै हो, जो मेरे प्राणों की एक मात्र आधार हैं । वे सदा अद्भुत रंग रूप एवं रस की वर्षा करती हैं एवं महा प्रेम एवं सर्वोच्च सुख का सार स्वरूपा हैं । [1]
श्री राधा सहज रूप से स्नेही हैं, सहज रूप से आनंद की निधि हैं और सहज रूप से ही प्रीतम उनके ह्रदय में बसे हैं । श्री ललित किशोरी देव जी कहते हैं कि श्री कुंज बिहारिनी [अर्थात् कुंजों में विहार करने वाली हमारी राधा] हर क्षण नित्य विहार रस ही विलसती रहती हैं । [2]
अद्भुत रंग रूप रस बरषत महा प्रेम अति सुख कौ सार ॥ [1]
सहज सनेही सहज आनंद निधि सहज रसिक प्रीतम उर हार ।
श्रीकुंजबिहारिनि ललितकिसोरी छिन छिन बिलसत नित्यबिहार ॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (8)
श्री राधे रानी की जै हो, जो मेरे प्राणों की एक मात्र आधार हैं । वे सदा अद्भुत रंग रूप एवं रस की वर्षा करती हैं एवं महा प्रेम एवं सर्वोच्च सुख का सार स्वरूपा हैं । [1]
श्री राधा सहज रूप से स्नेही हैं, सहज रूप से आनंद की निधि हैं और सहज रूप से ही प्रीतम उनके ह्रदय में बसे हैं । श्री ललित किशोरी देव जी कहते हैं कि श्री कुंज बिहारिनी [अर्थात् कुंजों में विहार करने वाली हमारी राधा] हर क्षण नित्य विहार रस ही विलसती रहती हैं । [2]

