बैठी कुंज माँहि महारानी ब्रजराज जू की,
अंग की सुगंधि भौंर भ्रमत भ्रमाने से। [1]
चाह भरी दासी सुखरासी चौंर छत्र लिये,
कोऊ परबीनें राग गामें मनमाने से॥ [2]
'लाल बलबीर' कर जोरत महेस सेस,
सहित दिनेस उर रहत सकाने से। [3]
याकी पद रेनु जाचें नारद सुरेस ठाड़े,
राधे महारानी के दुआरे दरबाने से॥ [4]
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (21)
कुंज महल के भीतर ब्रज की महारानी श्री राधिका बैठीं हैं जिनके अंगों की सुगंध से भँवर मतवाले से हो रहे हैं। [1]
श्री राधा की दासी उन्मत्त होकर सुख की राशि राधिका की सेवा कर रही हैं। कोई चँवर डुला रही है, कोई छत्र लिए खड़ी है, और कोई प्रवीण राग में मगन होकर गान कर रही है। [2]
श्री लाल बलबीर कहते हैं कि शिव, शेष, दिनेश आदि हाथ जोड़कर भयभीत से खड़े हैं। [3]
नारद, देवराज इंद्र आदि श्री राधा महारानी की पद रज की चाह में उनके द्वार पर द्वारपाल की तरह खड़े हुए हैं। [4]
अंग की सुगंधि भौंर भ्रमत भ्रमाने से। [1]
चाह भरी दासी सुखरासी चौंर छत्र लिये,
कोऊ परबीनें राग गामें मनमाने से॥ [2]
'लाल बलबीर' कर जोरत महेस सेस,
सहित दिनेस उर रहत सकाने से। [3]
याकी पद रेनु जाचें नारद सुरेस ठाड़े,
राधे महारानी के दुआरे दरबाने से॥ [4]
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (21)
कुंज महल के भीतर ब्रज की महारानी श्री राधिका बैठीं हैं जिनके अंगों की सुगंध से भँवर मतवाले से हो रहे हैं। [1]
श्री राधा की दासी उन्मत्त होकर सुख की राशि राधिका की सेवा कर रही हैं। कोई चँवर डुला रही है, कोई छत्र लिए खड़ी है, और कोई प्रवीण राग में मगन होकर गान कर रही है। [2]
श्री लाल बलबीर कहते हैं कि शिव, शेष, दिनेश आदि हाथ जोड़कर भयभीत से खड़े हैं। [3]
नारद, देवराज इंद्र आदि श्री राधा महारानी की पद रज की चाह में उनके द्वार पर द्वारपाल की तरह खड़े हुए हैं। [4]

