मैं अपने मन मूढ़ते, डरत रहत हौं हाय - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी)

मैं अपने मन मूढ़ते, डरत रहत हौं हाय - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी)

मैं अपने मन मूढ़ते, डरत रहत हौं हाय ।
वृन्दावन की ओर ते, मति कबहूँ फिरि जाय ॥

- श्री नागरी दास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी

श्री नागरीदास जी कहते हैं कि मैं इस बात की कल्पना से सदा भयभीत रहता हूँ कि कहीं ऐसा न हो कि मेरी मूढ़ मति इस दिव्य धाम वृंदावन से फिर जाए (अर्थात् इस श्रीधाम से मुझे विमुख न कर दे) ।