जब ते निरखी छबि तेरी लला - श्री ललित विहारिणि जी

जब ते निरखी छबि तेरी लला - श्री ललित विहारिणि जी

(सवैया)
जब ते निरखी छबि तेरी लला, कुछ ऐसी घटी जो न जाय भनी है। [1]
बंक विलोकत तिरछे तीरन, चोट चितै अति आयी घनी है॥ [2]
घटी सो घटी सो बनी पै बनी, करि घायल क्यों रे ढिठाई ठनी है। [3]
लालविहारी रूप रंगी तुव, 'ललितबिहारिनि' प्रेम सनी है॥ [4]

- श्री ललित विहारिणि जी

हे बाँके बिहारी! जब से तुम्हारी मनोहर छवि को निहारा है, तब से ऐसी दशा बनी है जिसका पार पाना अत्यंत कठिन हो गया है। [1]

तुम्हारी बाँकी चितवन के तिरछे तीरों ने मेरे हृदय पर गहरी चोट कर दी है। [2]

अब जो कुछ घटा सो घटा, पर हृदय को घायल करने के बाद भी तुम्हारी इन चितवनों की चपलता ज्यों की त्यों ठनी हुई है। [3]

श्री ललित विहारिणी जी कहती हैं—“हे लाल बिहारी! अब यह तुम्हारे प्रेम में भीगकर तुम्हारे रूप के रंग में पूरी तरह रंग चुकी है।” [4]