प्यारी, प्रीतम आरति करतु - श्री सूरदास, सूरसागर (3422)

प्यारी, प्रीतम आरति करतु - श्री सूरदास, सूरसागर (3422)

(राग केदारौ)
प्यारी, प्रीतम आरति करतु।
तुम्हरे कारन कुमरि राधिका, मेरे पांयनि परतु॥ [1]
वरही मुकट लुठन अवनी पर, नाहिंन निज भुज भरतु।
बार बार रहटि के घट ज्यौं, भरि भरि लोचन ढरतु॥ [2]
अति आधीन मीन ज्यौं जल बिनु, नाहिंन धीरज धरतु।
'सूर' सुजान सखी सुन तुम विनु,मनमथ पावक जरतु॥ [3]

- श्री सूरदास, सूरसागर (3422)

श्री राधा की एक अंतरंग सखी श्री राधा से कहती है, हे राधे, प्रीतम श्री कृष्ण तुमसे मिलने के लिए अत्यंत व्याकुल हैं। वे तुमसे मिलने के लिए मेरे चरणों में गिरकर प्रार्थना कर रहे हैं। [1]

उनका मुकुट बार बार धरती पर लुढ़क रहा है और वे अपने हाथों से उसको उठा भी नहीं रहे। तुमसे मिलन की व्याकुलता में वे ऐसे भर भर कर आँसु बहा रहे हैं मानो कुएँ से पानी निकाने वाला कोई रहँट हो। [2]

जिस प्रकार मछली जल के अति आधीन होती है और उसके बिना रह नहीं सकती उसी प्रकार श्री सूरदास जी कहते हैं कि हे सुजान सखी (राधा) तुम्हारे बिना, कामदेव को भी पावन करने वाले श्री कृष्ण, विरह की अग्नि में जल रहे हैं। [3]