श्री हरिवंश स्वरूप हैं, श्रीहरिदास उदार ।
जे जे बातें महल की, बरनत नित्य विहार ॥
- श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (18)
श्री वंशी अलि जी के अनुसार श्री हरिवंश एवं श्री हरिदास दोनों एक ही स्वरूप हैं, जिन्होंने प्रिया-प्रियतम के निज महल के नित्य विहार रस का ही वर्णन किया है।
जे जे बातें महल की, बरनत नित्य विहार ॥
- श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (18)
श्री वंशी अलि जी के अनुसार श्री हरिवंश एवं श्री हरिदास दोनों एक ही स्वरूप हैं, जिन्होंने प्रिया-प्रियतम के निज महल के नित्य विहार रस का ही वर्णन किया है।

