जब दर पे तुम्हारे ही अधमों का ठिकाना है - श्री बिंदु जी, मोहन मोहिनी

जब दर पे तुम्हारे ही अधमों का ठिकाना है - श्री बिंदु जी, मोहन मोहिनी

भजन श्यामसुंदर का करते रहोगे ।
तो संसार सागर से तरते रहोगे ॥ [1]
कृपानाथ बेशक मिलेंगे किसी दिन ।
तो सत्संग पथ से गुजरते रहोगे ॥ [2]
चढोगे हृदय पर सभी के सदा तुम ।
जो अभिमान गिरि से उतरते रहोगे ॥ [3]
न होगा कभी क्लेश मन को तुम्हारे ।
जो अपनी बड़ाई से डरते रहोगे ॥ [4]
छलक हीं पड़ेगा दयासिन्धु का दिल ।
जो दृग ‘बिन्दु’ से रोज भरते रहोगे ॥ [5]

- श्री बिंदु जी, मोहन मोहिनी

जो जीव श्यामसुन्दर का भजन करता रहता है उसका यह संसार सागर कुछ नहीं बिगाड़ सकता एवं वह इसे पार कर लेता है । [1]

निस्संदेह तुमको कृपा नाथ श्री कृष्ण मिलेंगें यदि तुम सत्संग रूपी मार्ग से चलोगे । [2]

तुम सबके ह्रदय में चढ़ोगे [वास करोगे] यदि तुम अभिमान रूपी पर्वत से उतरोगे । [3]

तुम्हारे ह्रदय को एक क्षण के लिए भी क्षोभ नहीं होगा यदि तुम अपनी बड़ाई [सम्मान की इच्छा] से बचते रहोगे । [4]

दयासिन्धु [भगवान] का ह्रदय अवश्य ही एक दिन छलकेगा यदि तुम रोज़ उसमें प्रेम भरे आँसु भरते रहोगे (अर्थात् उनकी याद में रोज़ आँसु बहाया करोगे ) । [5]