(राग गौड़)
नाचत मोरनि संग स्याम
मुदित स्यामाहिं रिझावत । [1]
तैसीयै कोकिला अलापत पपीहा देत सुर
तैसेई मेघ गरजि मृदंग बजावत ॥ [2]
तैसीयै स्याम घटा निसि सी कारी
तैसीयै दामिनी कौंधि दीप दिखावत । [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी
रीझि राधे हँसि कंठ लगावत ॥ [4]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (96)
श्री श्यामसुंदर मोरों के संग मनभावन नृत्य कर श्री श्यामा जू को रिझा रहे हैं । [1]
उसी प्रकार कोयल गान करने लगी और पपीहा भी उसके संग अपना सुर मिला देती है । उसी प्रकार मेघों की गड़गड़ाहट ऐसी लग रही है मानो मृदंग बज रहे हों । [2]
उसी प्रकार काले घने बादल रात्रि के समान प्रतीत हो रहे हैं, उसी प्रकार बिजली ऐसे चमक रही है जैसे दीपक जगे हों । [3]
स्वामी श्री हरिदास की स्वामिनी श्यामा [राधे] प्रसन्न हैं और उन्होंने कुंजबिहारी [कृष्ण] को गले लगा लिया है। [4]
नाचत मोरनि संग स्याम
मुदित स्यामाहिं रिझावत । [1]
तैसीयै कोकिला अलापत पपीहा देत सुर
तैसेई मेघ गरजि मृदंग बजावत ॥ [2]
तैसीयै स्याम घटा निसि सी कारी
तैसीयै दामिनी कौंधि दीप दिखावत । [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी
रीझि राधे हँसि कंठ लगावत ॥ [4]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (96)
श्री श्यामसुंदर मोरों के संग मनभावन नृत्य कर श्री श्यामा जू को रिझा रहे हैं । [1]
उसी प्रकार कोयल गान करने लगी और पपीहा भी उसके संग अपना सुर मिला देती है । उसी प्रकार मेघों की गड़गड़ाहट ऐसी लग रही है मानो मृदंग बज रहे हों । [2]
उसी प्रकार काले घने बादल रात्रि के समान प्रतीत हो रहे हैं, उसी प्रकार बिजली ऐसे चमक रही है जैसे दीपक जगे हों । [3]
स्वामी श्री हरिदास की स्वामिनी श्यामा [राधे] प्रसन्न हैं और उन्होंने कुंजबिहारी [कृष्ण] को गले लगा लिया है। [4]

