ज्ञान ध्यान विद्या मती, मत बिस्वास बिवेक ।
विना प्रेम सब धूर हैं, अग जग एक अनेक ॥
- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (25)
ज्ञान, ध्यान, विद्या, विविध मतों का विश्वास और विवेक आदि सब बिना प्रेम के धूलि के समान निरर्थक हैं, क्योंकि प्रेम वह तत्त्व है जो ब्रह्म की भाँति इस संसार में एक होते हुए अनेक रूपों में दिखाई देता है।
विना प्रेम सब धूर हैं, अग जग एक अनेक ॥
- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (25)
ज्ञान, ध्यान, विद्या, विविध मतों का विश्वास और विवेक आदि सब बिना प्रेम के धूलि के समान निरर्थक हैं, क्योंकि प्रेम वह तत्त्व है जो ब्रह्म की भाँति इस संसार में एक होते हुए अनेक रूपों में दिखाई देता है।

