धन धन वृंदावन के मैंडक प्यारे ।
ठाकुर की मोरी में बैठें बोलें न्यारे न्यारे ॥ [1]
महाप्रसाद को पानी पीवैं मिट गये पाप सवारे ।
अभयराम ऐहू बड़भागी रज में रहैं विचारे ॥ [2]
- श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (76)
श्री वृंदावन धाम के मेंडक धन्य धन्य हैं जो ठाकुर जी के मंदिर की नाली में बैठ कर न्यारे न्यारे ढंग से बोलते हैं । [1]
वे महाप्रसाद का पानी पीकर सारे अपने पापों को मिटा देते हैं । श्री अभयराम कहते हैं कि ये मेंडक भी बड़भागी हैं जो वृन्दावन की रज में पड़े रहते हैं । [2]
ठाकुर की मोरी में बैठें बोलें न्यारे न्यारे ॥ [1]
महाप्रसाद को पानी पीवैं मिट गये पाप सवारे ।
अभयराम ऐहू बड़भागी रज में रहैं विचारे ॥ [2]
- श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (76)
श्री वृंदावन धाम के मेंडक धन्य धन्य हैं जो ठाकुर जी के मंदिर की नाली में बैठ कर न्यारे न्यारे ढंग से बोलते हैं । [1]
वे महाप्रसाद का पानी पीकर सारे अपने पापों को मिटा देते हैं । श्री अभयराम कहते हैं कि ये मेंडक भी बड़भागी हैं जो वृन्दावन की रज में पड़े रहते हैं । [2]

