(सवैया)
दीनदयाल कहाय के धायकें, क्यों दीननसौं नेह बढ़ायौ।
त्यौं हरिचंद जू बेदन में, करुणा निधि नाम कहो क्यौं गायौ॥ [1]
एती रुखाई न चाहियै तापै, कृपा करिके जेहि को अपनायौ।
ऐसौ ही जोपै सूभाव रह्यौं तौ, गरीब निबाज क्यौं नाम धरायौ॥ [2]
- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, प्रेम माधुरी (39)
एक भक्त बाँके बिहारी से मानपूर्वक प्रेम से कहता है—
सर्वप्रथम तो आप स्वयं को ‘दीनदयाल’ कहलवाते हैं, फिर दीनजनों से नेह बढ़ाते हो अथवा वे आपसे प्रेम करने लगते हैं। उसी प्रकार वेदों में भी स्वयं को करुणा निधि नाम से कहलवाते हो। [1]
अब जब आप जीव को अपना बना लेते हो और वह जीव भी आपको अपना मान लेता है, तो फिर इस प्रकार रुखाई क्यों दिखाते हो?
यदि आपका स्वभाव यही है, तो अपना नाम ‘गरीब-निवाज़’ क्यों रखा है? [2]
दीनदयाल कहाय के धायकें, क्यों दीननसौं नेह बढ़ायौ।
त्यौं हरिचंद जू बेदन में, करुणा निधि नाम कहो क्यौं गायौ॥ [1]
एती रुखाई न चाहियै तापै, कृपा करिके जेहि को अपनायौ।
ऐसौ ही जोपै सूभाव रह्यौं तौ, गरीब निबाज क्यौं नाम धरायौ॥ [2]
- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, प्रेम माधुरी (39)
एक भक्त बाँके बिहारी से मानपूर्वक प्रेम से कहता है—
सर्वप्रथम तो आप स्वयं को ‘दीनदयाल’ कहलवाते हैं, फिर दीनजनों से नेह बढ़ाते हो अथवा वे आपसे प्रेम करने लगते हैं। उसी प्रकार वेदों में भी स्वयं को करुणा निधि नाम से कहलवाते हो। [1]
अब जब आप जीव को अपना बना लेते हो और वह जीव भी आपको अपना मान लेता है, तो फिर इस प्रकार रुखाई क्यों दिखाते हो?
यदि आपका स्वभाव यही है, तो अपना नाम ‘गरीब-निवाज़’ क्यों रखा है? [2]

