तीन लोक कौ राज सुख, देखौ तुला चढ़ाई ।
निमिष प्रेम सुख गरुव अति, तेही आगैं घटि जाइ ॥
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, अनुराग लता (7)
श्री वृंदावन की रज एवं प्रेम-रस के आगे तीनों लोक का राज-सुख, वैभव आदि कुछ भी नहीं है। यदि उसे तुला पर रखकर तोलें, तो उस वृंदावन प्रेमी के पल-भर का प्राप्त किया हुआ सुख त्रिलोक के राज-सुख को तुच्छ या हल्का कर दे।
निमिष प्रेम सुख गरुव अति, तेही आगैं घटि जाइ ॥
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, अनुराग लता (7)
श्री वृंदावन की रज एवं प्रेम-रस के आगे तीनों लोक का राज-सुख, वैभव आदि कुछ भी नहीं है। यदि उसे तुला पर रखकर तोलें, तो उस वृंदावन प्रेमी के पल-भर का प्राप्त किया हुआ सुख त्रिलोक के राज-सुख को तुच्छ या हल्का कर दे।

