एक रसना किम कहूँ, गुण प्रकट विविध विहार ।
नित्य लीला, नित्य नूतन, श्रुति न पामें पार ॥
- श्री चतुर्भुजदास जी
जिस श्री कृष्ण के विहार का गान करने में वेद भी असमर्थ हैं, जिसकी लीला नित्य है, जो क्षण-क्षण नवीन लगती है, उसके गुणों का एक रसना से वर्णन करना मेरे लिए असंभव है।
नित्य लीला, नित्य नूतन, श्रुति न पामें पार ॥
- श्री चतुर्भुजदास जी
जिस श्री कृष्ण के विहार का गान करने में वेद भी असमर्थ हैं, जिसकी लीला नित्य है, जो क्षण-क्षण नवीन लगती है, उसके गुणों का एक रसना से वर्णन करना मेरे लिए असंभव है।

